Sunday, March 23, 2014

Chris & Rukh #1

CHRIS:
रातों को कोई डर के
करीब अपने घर के
जलाता है आग मर के

रातों की नींद उसकी
खो जाये सुबह जिसकी
यादें बुझाये विस्की
यादें जलाये विस्की

मेरे दिल के आशियाँ में
रातों के कारवाँ में
काफिलों के दरमियां में
अंजाम--दास्तान में

ख्वाबों का एक दिया है
जो जल के बुझ गया है
जैसे रोशनी ने लिख दिया है
अब तुझसे ना कोई वास्ता है

RUKH:
रातों की नींद उसकी
जिसको नहीं हो फिक्र
उनके ख्यालों में
क्यों हो ना मेरा ज़िक्र

काग़ज़ पे अपने दिल के
सियाही छिड़क के मैने
एक सुबह रोशन की है
तेरे नाम मैने की है

जबसे चली हैं राहें
हम साथ चल रहें हैं
तेरे रात के सफर में
रोशनी से जल रहें हैं

CHRIS:
तुमने था ढूँडा मुझको
इस भीड़ के सफर में
तन्हा सी ज़िंदगी में
बुझती सी रोशनी में

When you came to me
You needed me
Now that you are leaving
You say, you never needed me

You came to me
ना खुद में सिमटी
ना खुद में समायी
You came to me
जैसे धड़कन खुद से शर्मायी
खुद से डरी-डरी, खुद से घबराई

When you came to me
You needed me
Now that you are leaving
You say, you never needed me

RUKH
जलती हुई सुबह से
शमा ने बुझ के पूछा
Do you need me
Do you need me

When I came to you
I needed you
Now that you are leaving
You say, I never needed you

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